आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

“बाबरा ख़ामुशी में तूफ़ाँ रहता है”

                
                                                         
                            मयकदे में भी हमारा कुछ फ़साना रहता है,
                                                                 
                            
जाम ख़ाली हो तो दिल में इक तराना रहता है।

हमने देखा है यहाँ चेहरों के पीछे भी नक़ाब,
हर किसी के पास अपना एक बहाना रहता है।

शायरी केवल सुख़न की दास्ताँ होती नहीं,
दर्द जब हद से गुज़रता है, फ़साना रहता है।

हम किसी से माँगते हैं क्या वफ़ा की भीख अब,
दिल में जो बस जाए, उसका ही ठिकाना रहता है।

कल तलक जो साथ था, अब दूर बैठा है मगर,
याद में उसकी अभी तक इक ज़माना रहता है।

हारकर भी हम कभी मायूस होते ही नहीं,
ज़िंदगी में जीत का कोई बहाना रहता है।

फूल मुरझाते हैं, लेकिन ख़ुशबुएँ मरती नहीं,
इश्क़ सच्चा हो तो उसका इक निशाना रहता है।

जो समझते हैं कि दौलत से ख़रीदेंगे सुकूँ,
उनके घर में भी कोई दिल का ख़ज़ाना रहता है।

ख़ामुशी को तुम कमज़ोरी मत समझो दोस्तों,
इसमें अक्सर एक तूफ़ाँ अनजाना रहता है।

हमने रिश्तों को निभाया है ख़ुदा जाने कहाँ,
आज भी दिल में वही रिश्ता पुराना रहता है।

‘बाबरा’ दुनिया बदलती है तो बदले शौक़ से,
दिल में इंसाँ हो तो इंसाँ का ज़माना रहता है।
-सुशील कुमार 'बाबरा'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर