आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तेरी गलियों से गुजरा करता हूँ

                
                                                         
                            तेरी गलियों से गुजरा करता हूँ
                                                                 
                            
अपनी आदत से चौंका करता हूँ

बन के संदल तेरी खुशबू आती
उस दर का दिल से सज़दा करता हूँ

मुझमें नफ़रत की नागफ़नी फैली
काँटों सा सबको देखा करता हूँ

तेरी गलियों से गुजरा करता हूँ
अपनी आदत से चौंका करता हूँ

मेरी बातें जब मानी ना जाती
पहरों-पहरों मैं रोया करता हूँ

कुछ गर्मी मेरे भीतर ही होती
कुछ उर्जा ख़ुद मैं पैदा करता हूँ

तेरी गलियों से गुजरा करता हूँ
अपनी आदत से चौंका करता हूँ

बहकावे में मेरे कोई आए
मक़सद उनसे मैं पूरा करता हूँ

दिल की खाली कोठी है तो बोलो
मैं जाकर अब ही कब्ज़ा करता हूँ

तेरी गलियों से गुजरा करता हूँ
अपनी आदत से चौंका करता हूँ


अखरा-अखरा तब लगता है मुझको
पाकर तुमको जब खोया करता हूँ

जाने कैसी मुश्किल में हूँ उलझा,
मैं खुद ही अक्सर तड़पा करता हूँ।

दुनियादारी की बातें छोड़ो शील,
कुछ सपनों का मैं सौदा करता हूँ।

तेरी गलियों से गुजरा करता हूँ
अपनी आदत से चौंका करता हूँ
-सुशीलयादव
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर