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गुरु महिमा

                
                                                         
                            ज्ञान निधान प्रकाश करैं, गुरु ज्ञान-प्रदीप विवेक प्रभारी।
                                                                 
                            
अक्षर बोध करावनहार, सुमानस हंस सुभाग विहारी।
वेद विचार विभूषित मूर्ति, करुणानिधि सिंधु कृपा अवतारी।
पाहि! प्रभो! मम मोह-विमोचन! त्राहि! कृपालु हे! ज्ञान-विहारी॥१॥

शीतल चंद्र समान सुधाकर,देवनि वृंद सभा शुभकारी।
पातक पुंज विनाशनहार, महा तम पुंज निवारण हारी।
पावन ज्ञान निधान सुधान,सुमानवता पथ दर्शक धारी।
पाहि! प्रभो! मम मोह-विमोचन! त्राहि! कृपालु हे! ज्ञान-विहारी॥२॥

भक्ति विवेक विराग विभूषण, धर्म-धुरंधर  पथ-उजियारी।
दीन अनाथ अकिंचन पालक, प्रेम सुधा के नित्य पुजारी।
संशय शूल उखारि मिटावत,
बुद्धि करैं अति निर्मल सारी।
पाहि! प्रभो! मम मोह-विमोचन! त्राहि! कृपालु हे! ज्ञान-विहारी॥३॥

मात-पिता सम स्नेह लुटावत, हित-अनहित सब भाँति विचारी। दोष निहारि सुधार करावत, अमंगल-मेटि सुमंगलकारी।
दीनन पै बहु छाह धरैं, जन-रंजन, सज्जन-काज-सुधारी।
पाहि! प्रभो! मम मोह-विमोचन! त्राहि! कृपालु हे! ज्ञान-विहारी॥४॥

लोभ मदादि विकार मिटावत, सत्य सुगंध सदैव पसारी।
क्रोध अशान्ति अशेष हरे, नव भाव सुज्ञान तरंग तुम्हारी।
कर्म-सुभाव को लक्ष्य दिखावत, बनि दीपक पथ जग-उजियारी।
पाहि! प्रभो! मम मोह-विमोचन! त्राहि! कृपालु हे! ज्ञान-विहारी॥५॥

अष्टहु सिद्धि नवोनिधि पावत, जो रज शीश धरैं गुरु न्यारी।
काल कपाल कटाक्ष न लागइ, जे गुरुदेव कृपा उर धारी।
मोह महा मद ज्वाल बुझावत, भक्ति सुधा- रस वृष्टि सुखारी।
पाहि! प्रभो! मम मोह-विमोचन! त्राहि! कृपालु हे! ज्ञान-विहारी॥६॥

नाद अनाहत अंतर बाजत, मोद अनन्त अगाध अधारी।
जाति, कुलीन न सेवक पूछत, भाव भजत सब एकहि बारी।
देव सुरेश महामुनि सेवत, पाहि अनंत सुधा-भंडारी।
पाहि! प्रभो! मम मोह-विमोचन! त्राहि! कृपालु हे! ज्ञान-विहारी॥७॥

जीवन का पथ घेरत संशय, धैर्य-धनुष गुरु सत्य प्रभारी।
श्री गुरु देव नमामि पदम्, मति मूढ़ अनारी कूँ लेहु सँभारी।
वेद न पावत पार अपार, प्रभो मन मंदमती मम पाँव पखारी।
पाहि! प्रभो! मम मोह-विमोचन! त्राहि! कृपालु हे! ज्ञान-विहारी॥८॥
-सुशील शर्मा
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2 महीने पहले

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