मुट्ठी बंद कर आये थे
साथ में क्या लाए थे
रिश्ते सब यहीं के हैं
नाते यही जुडाये थे ,
जायजाद बाप दादा का
बरक्कत यही कमाये थे,
दोस्ती यही की है
दुश्मनी यही की है
यही कमाये यही गंवाओगे
कुछ मिट्टी कुछ हवा में मिल जाओगे ||
नफरत और मुहब्बत भी
दिलों में सजाये थे ,
जाना तो है ही एक दिन
बताना तो क्या लेकर जाओगे,
ले जाओगे इज्जत और शोहरत
मोहब्बत और नफरत
जायजाद और बरक्कत
कुछ हसरत और हरकत,
यही कमाये यही गंवाओगे
कुछ मिट्टी कुछ हवा में मिल जाओगे ||
कुछ दुआएं और बद्दुआएं
या मुट्ठी भर सांस और हवाएं,
ले जाओगे क्या खूबसूरत नजारे
कुछ बाल बच्चे यार दोस्त प्यारे,
कुछ सोना चांदी हीरे जवाहरात
कुछ रौब दबदबा हनक भी क्या साथ
कुछ जमीन कुछ मकान खेत खलिहान
गाडी घोड़ा , छत्तीस व्यंजन स्वादिष्ट पकवान ,
यही कमाये यही गंवाओगे
कुछ मिट्टी कुछ हवा में मिल जाओगे ||
शायद सब यही रह जाएंगे
खाली हाथ आये, खाली ही जायेंगे
छीना झपटी छल कपट फिर इतना पाप आखिर
कर्म ही गठरी बनेंगे और करेंगे हिसाब ,
क्या मिला क्या खो गया है
फिर क्या मिले क्यों संताप आखिर
ये खुशी कब तक रहेगी
कब तक करोगे विलाप आखिर,
यही कमाये यही गंवाओगे
कुछ मिट्टी कुछ हवा में मिल जाओगे ||
-सूर्य मणि दूबे 'सूर्य'
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