अज़ब haal
ज़िंदगी का अज़ब हाल देखा,
जिस की भी मदद की,
वक्त पड़ने पर
उसी का ठेंगा देखा।
कोई सखा
कोई सहयोगी
कोई रिश्ता
कोई नाता
बन आया,
बाद में वक्त निकलने पर
उसी ने पीठ में खंज़र भौंका।
कुछ बड़े
कुछ बजुर्ग
और तो और
कुछ श्रद्धेय
ऑ आदरणीय
सबने अपनी डफली
और अपना ही राग
अलापा।
कुछ ख़्वाब
कुछ ख्याल
आते रहे जाते रहे
पास लाने की कशिश में
जब भी तदबीर की
बात आई
तो उन्हें भी तकदीर के
पहलू में बैठे देखा।
-सूर्यकांत शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X