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अब सत्य से मिलवा चुकी है।

                
                                                         
                            अतीत से बाहर निकलो,,,,
                                                                 
                            

सब लोग जा चुके हैं,
सुंदर सी यादों में बसे लोग,
बस याद बन चुके हैं।

तुम्हें संस्कारों संवेदनाओं से
सींचने वाले
सभी गुरुजन
जा चुके हैं,
तुम्हें यादों में संजोने वाले ,
सभी प्रतिमान अब सो चुके हैं।

तुम्हारी बचपन की नादानियां
ऑ शैतानियों को बंया करने वाले,
सभी लोग दुनिया को अलविदा
कह चुके हैं।

तुम्हें पढ़ने को बिठाने
और तुम पर निगाह
रखने रखने वाले,
अब फोटो के फ्रेम में
समा चुके हैं।

तुम्हारी गलतियों को
छुपा कर सही रास्ते पर
चलाने वाले,
सभी जन सदुर
दिव्य यात्रा पर जा चुके हैं।

श्रम संवेद कणों को, संजो कर,
तुम्हें प्रगति पथ पर बढ़ाने वाले
गुणीजन अब चिरनिद्रा में
सो चुके हैं।

तुम्हारे इंतज़ार में,
देर रात तक दरवाज़े को
निहारने वाली आंखें,
अब थक कर सो चुकी हैं।

वो पहली नौकरी पर
दही चीनी को खिलाने की
जादुई रस्म निभाने वाले,
अब पराए घर जा चुके हैं।

पर अभी सभी कुछ गया नहीं है,
तुम्हें रूमानियत से सराबोर कर ,
दुनिया से लड़ कर जीतना
सीखने वाले लोग
अभी तुम्हारे साथ चल रहे हैं।

अतीत से बाहर आओ देखो,
अभी भी तुम्हें एकटक
निहारने वाली दो आंखें,
तुम्हारे साथ दूर तक
आ चुकी हैं।

तुम्हारा साथ निभाते निभाते
मन भावन,अब तुम्हारा साथ
आगे तक निभाने आ चुकी हैं।

गृहस्थ से वानप्रस्थ में
तुम्हारी जीवन संगिनी,
यहाँ तक आ चुकी है।
इक्के -दुक्के सहज सपन्न
मित्र जन ,
अब तुम्हारे साथ
तक आ चुके हैं।

अतीत से बाहर निकलो
,'सूर्य ' ज़िन्दगी तुम्हें
अब सत्य से मिलवा चुकी है।

 
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3 घंटे पहले

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