असली की कीमत ,,,
दुनिया का अज़ब दस्तूर देखा,
असली की कीमत पर
नकली को गद्दी-नशीन देखा।
यूं तो दौर- ए -जहां रहा है
सीरत- ए -वफा का कायल
पर हमने सूरत- ए -जफा
को मा-बदौलत बनते देखा।
मुहब्बत- ए -इबादत
इबादत- ए -मुहब्बत
बस बंदगी है।
पर हमने तो यहां भी
सियासत को दखल
देते देखा।
सुना था
सोहबत- ए -इश्क
सोहबत -ए -हुस्न
बस कुछ नहीं
इंसानियत -ए -इत्र है।
हमने तो
तिलस्म -ए- खुदगर्ज़ी
में शैतान को शान से
बैठे देखा।
साहिर कभी थे
रहनुमा ए आधी आबादी
लिखते थे गीत ग़ज़ल
कहते थे पढ़ते थे
मानीखेज अशआर।
होनी थी जो
मरकज -ए- जियारत
हमने तो उसी साहिर की कब्र
को भी फ़ना होते देखा।
असली की कीमत पर
हमने तो नकली को
काबिज़ होते देखा।
दिल की धड़कन
बंदिश- ए -मौसीकी
को बीते जमाने की
परवाज़ समझ
आँखो की मस्ती को
आवाम के दिल ओ दिमाग
पर अब हावी होते देखा।
' साहिर 'को कौन याद करे
अब तो हमने उसके
यौम - ए -पैदाइश को भी
महज़ नुमाइश बनते देखा।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा
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