क्या कोई अंगड़ाईयाँ भी।
लेना अपनी छोड़ देगा।
हम नदी तक जा बसे हैं।
तो नदी के हो गये हैं।
एक पल मदमस्त होकर।
के किनारों से मिली हो।
तात के कंधे चढ़ी हो।
यूँ पहाड़ों से मिली हो।
जो भी ज़द में उसकी आये।
वो उसी के हो गये हैं।
हम नदी तक जा बसे हैं।
तो नदी के हो गये हैं।
ये कोई मानव नहीं है।
जो इसे तुम रोक लोगे।
ये दबी कुचली नहीं है।
जिसको हरपल टोक दोगे।
ये जो गंगा, सिंधु, झेलम।
सब सदी के हो गये हैं।
हम नदी तक जा बसे हैं।
तो नदी के हो गये हैं।
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