आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नियति का खेल

                
                                                         
                            यह तो ,
                                                                 
                            
बिल्कुल - -
सोलह आना,
सच है कि - -
कुदरत और किस्मत,
के अनुसार - -
ढ़लना परता है,
इस प्रकार - -
किस्मत ने,
जैसा चाहा - -
वैसे ढल गये हम l

हमने बहुत,
संभल - संभल कर - -
चलने का,
प्रयास किया - -
फिर भी हम,
फिसल गये - -
सच में,
किसी ने - -
विश्वास को तोड़ा,
या यों कहे कि - -
किसी ने,
विश्वास को - -
तोड़ने का,
प्रयास किया - -
और तो और,
किसी ने - -
दिल तोरा,
या दिल तोड़ने का - -
प्रयास किया,
लकिन - -
लोग उल्टे हम पे,
आरोप- प्रत्यारोप - -
लगाने लगे कि,
देखो- देखो - -
कितना बदल गया l
-सुरेश कुमार झा 'अल्हर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर