आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अगर सच में ईश्वर कही बैठा होगा – कल्पना

                
                                                         
                            अगर सच में ईश्वर कही बैठा होगा – कल्पना
                                                                 
                            

अगर सच में ईश्वर कहीं बैठा होगा,
तो हमारी इन चालाकियों पर चुपके से हँसता होगा।
हम मुखौटे पहनकर घूमते हैं यहाँ,
अंदर कुछ और, बाहर कुछ और दिखाते हैं जहाँ।
वो बंद आँखों से भी सब देख लेता होगा,
हमारी इन बेतुकी कोशिशों पर हँसता होगा।
मंदिरों में दुआएँ, और दिल में दग़ा रखते हैं,
ज़ुबाँ पे मिठास, और नज़रों में अनबना रखते हैं।
जब हम धर्म और अच्छाई का ढोंग रचाते होंगे,
वो सोचता होगा—'ये किसे बेवक़ूफ़ बनाते होंगे?'
अंदर का अंधेरा छिपाकर, बाहर जो उजला बनते हैं,
वो इंसान के इस दोहरेपन पर मुस्कुराता होगा,
और सोचता होगा...
"बनाया तो मैंने इसे अपने अक्स जैसा था,
ये मिट्टी का पुतला आज क्या से क्या बनता होगा!"
एक छोटा सा ख़याल:
ईश्वर को रिझाने के लिए सादगी ही काफ़ी है, क्योंकि जो सच छुपाने की कोशिश करता है, वो दुनिया को भले छले, पर उस 'बनाने वाले' से कुछ छुपा नहीं पाता।
-सुरज पटेल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर