ऐ गुज़रने वालों, तुम तो मुक़द्दर लिखते थे ना,
सुना है अब पढ़ भी लेते हो मुझे।
फ़िज़ूल ही परवाह कर रहे थे उनकी,
पता चला है उनकी परवाह करने वाले तो हज़ारों हैं।
बड़े ख़ुशमिज़ाज लगते हो,
गिले-शिकवे, नाराज़ हैं क्या?
भोर हो गई थी उनकी,
हम तो शाम के इंतज़ार में बैठे थे।
ये इंतज़ार अच्छा है शायद,
तो क्या ज़िंदगी गुज़ार दें?
लोग कहते हैं मोहब्बत क़ैद है,
हम तो तस्वीर में क़ैद थे।
बहुत मशक़्क़त की उन्हें ढूँढने में,
मिले भी तो कहाँ, जहाँ कफ़न सजाई जा रही थी।
जहाँ मेरा है, ये भी मैं कह दूँ,
पर जो मेरा है, वो कहाँ है?
तलब लगी है उनसे मिलने की,
पर वो तो अब ख़ुदा बन गए हैं ना।
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