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कवि नहीं हूँ मैं

                
                                                         
                            कौन जानेगा मुझ अभागे को,
                                                                 
                            
मैं लिखता हूँ,
लिखना काम है मेरा।
शायद राज़ नाम है मेरा,
नहीं जानते होंगे
क्यों...?

आजकल लोग तो अपने स्टार मोबाइल से चुनते हैं ना,
फिर किताब से मेरी पहचान कैसे होगी?
शायद कलम अपनी स्याही यूँ ही कुर्बान करती होगी,
वरन अक्षर के हिमायती भी तो लोग होते।
कतराते हैं लोग कलम छूने से,
शायद उन्हें स्याही कलंक लगती होगी।

सुलगा दे किताबों को,
ये विचार भी किसी को तो आया होगा।
पर कामकाज़ी देख,
मन को रिझलाया होगा।

अंगार उबलते हैं इनकी आँखों में,
मुझे सुनकर,
शायद कभी इनको सच से वाक़िफ़ करवाया होगा।

तुम्हारा वक़्त ज़ाया किया है मैंने,
शायद कुछ पहचान की चाहत रखता हूँ।
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9 घंटे पहले

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