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एक मैं थी

                
                                                         
                            एक मैं थी
                                                                 
                            
एक सांझ थी
एक नदी थी,
एक सूरज था,

मैं उदास थी
सांझ उदास थी
नदी उदास थी,
नदी के क्षितिज पर सूरज
भी उदास था

एक मैं थी
एक सुबह थी
एक नदी थी
एक सूरज था

मैं ऊर्जस्वित थी
सुबह उज्वल थी
नदी चंचल थी
सूरज प्रचंड था,

एक मैं थी
एक सुबह थी
एक सांझ थी
एक नदी थी
एक सूरज था

दो दर्पण थे
एक मेरे भीतर
एक मेरे बाहर

दोनों ने मुझे
सुबह,सांझ,सूरज
और नदी के चेहरे
अलग -अलग कोणों से दिखाये,
दो दर्पण
भीतर और बाहर,
एक सत्य,
भीतर और बाहर का…
-सुनीता भट्ट पैन्यूली
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3 महीने पहले

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