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सियासत का खेल

                
                                                         
                            सियासत का खेल
                                                                 
                            

शह और मात का खेल है राजनीति,
साज़िशों की महक का खेल है राजनीति।

चेहरों पे चेहरे, लबों पर मुस्कान,
झूठे वादों का महल है राजनीति।

एक-दूजे को गिराने की होड़ में,
ख़ुद को ऊँचा समझने का भ्रम है राजनीति।

कुर्सी की ख़ातिर बदलते हैं रिश्ते,
कहीं दोस्ती, कहीं बैर है राजनीति।

अपने ही अपनों की जड़ काटते हैं,
कैसा अजब ये मुक़द्दर है राजनीति!

सच की आवाज़ दबाई जाती है,
झूठ के हाथों में तलवार है राजनीति।

गुनहगारों के गुनाह छिपाए जाते हैं,
कहीं रहमत, कहीं दीवार है राजनीति।

जनता के सपनों से बनते हैं महल,
किसके हिस्से में अधिकार है राजनीति?

जब कुर्सी ही मंज़िल बन जाती है,
तब जनसेवा का भी व्यापार है राजनीति।

इतिहास गवाह है, वक़्त बोलेगा,
कर्मों का आख़िर हिसाब है राजनीति।

सत्ता का नशा उतर ही जाएगा,
जनता का फ़ैसला अंतिम प्रहार है राजनीति!
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एक दिन पहले

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