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एक अधूरी दास्तान

                
                                                         
                            हमने कब कहा था कि तुम हमारे जाओ,
                                                                 
                            
मेरी वीरान रूह में मोहब्बत के ख़्वाब जगाओ।
मगर तुम आए, मुझे अपने ख़्वाब दिखाए…
मै तो भूल चुका था जीना मगर,
तुम साथ अपने जीने की रौशनी ले आए।
कुछ पल का वो साथ बहुत हसीन था,
मगर यूँ अधूरा छोड़ जाना कहाँ का आईन था?
अगर जाना ही था, तो बता कर जाते,
अपनी यादों का कारवाँ भी ले जाते।
यूँ मेरी रातों का सुकूँ छीन कर,
मेरी रूह में अपना घर न बनाते।
चाहा था कि हमारे रास्ते कभी जुदा न हों,
तुम्हारे सिवा कोई मेरा हमसफ़र न हो ।
मगर अब बिछड़ ही गए हो, तो लौटकर मत आना,
वापस आकर फिर मुझे न तड़पाना।
मैं अब अपने भीतर कहीं बाकी नहीं रहा,
मैं जागूँगा शब भर… तुम चैन से सो जाना।
और आखिर में....
अगर कर सको कोई अहसान मुझ पर,
तो बस मेरी वो अमानत लौटा जाना—
मेरी हँसी, मेरा सुकूँ, मेरा वो गुज़रा वक़्त…
जहाँ भी छुपाया है, मुझे वापस दे जाना।
तुम तो शायद भूल चुके हो मुझे,
अब मेरी इस आख़िरी ख्वाइश को मान जाना—
भूलकर भी मुझे भी अब याद मत आना ।
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3 महीने पहले

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