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नारी अबला नहीं शक्तिपुंज है ।

                
                                                         
                            है शक्तिपुंज ये नारी इसे अबला नहीं जानो,
                                                                 
                            
सबल रचना विधाता की इसे समझो इसे मानो।
ये जननी भी है हननी भी बस ये तुम पर ही निर्भर है,
कि इसकी मान ममता से कभी तुम बैर न ठानो

ये अपनी कोख में रख सृष्टि का निर्माण करती है,
सींचकर दुग्ध से वो पुष्प को पाषाण करती है,
सजाती घर व आंगन को वो अपनी प्रेम निष्ठा से,
ये सदा संस्कारों की सृजन कर्ता को पहचानो।

रची जब सृष्टि ब्रह्मा ने चहुं दिशि मौन था छाया,
छेड़ कर तार वीणा का था जिसने स्वर को फैलाया,
सरस्वती दुर्गा काली सीता सब हैं रूप नारी के,
सावित्री भी यही गंगा यही कमला इसे मानो।

हुआ है जब भी दूषित मान नारी का किसी द्वारा,
किसी ने मान ममता को है उसके जब भी ललकारा,
हुआ संहार भीषण न बचा वो रावण न ही रावण,
समय है अब भी संभलो और इसकी शक्ति पहचानो।

रचित हैं नारी की महिमा करोड़ों रस व छंदों में,
किया सामर्थ्य भर वर्णित है मैंने भी स्व शब्दों में,
अखिल ब्रह्मांड भी है जब झुका इस शक्ति के आगे,
सुधा तुममें कहां क्षमता जो इसका मर्म तुम जानो।
है शक्तिपुंज ये नारी इसे अबला नहीं जानो।।

 
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5 दिन पहले

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