देखा मैंने जीवंत उदाहरण पापा के संघर्षों का,
कुछ घंटे,कुछ दिन का नहीं है संघर्ष है उनका वर्षों का ,
जीवन के ढलान में अब भी राह किसी की तकता नहीं है,
बाप कभी थकता नहीं है।
ढोती मां 9 माह गर्भ में मन - मस्तिष्क में ढोता है,
दर्द में हो जो औलाद तो वो छिप - छिप करके रोता है,
लोगों की रूढ़िवादी सोच से व्यक्त कभी करता नहीं है,
बाप कभी थकता नहीं है।
अपना पेट काटकर बच्चों को भरपेट खिलाता है,
खुद के जूते पुराने हो तो क्या बच्चों को नए दिलाता है,
नए दिलाने की लहक में अपने जूतों के छेद लखता नहीं है, बाप कभी थकता नहीं है।
पाई - पाई संजोकर बेटी का ब्याह रचाता है, खुद अमीर हो या गरीब बेटी को राज कुमारी बनाता है,
बेटी अगर दुख में याद भी करें तो बाप जरा सी भी देर करता नहीं है,
बाप कभी थकता नहीं है....।
बुढ़ापे की झुर्रिया तोड़ती रहती हैं उसके हौसले,
घिसी हड्डियों से फ़तह करता है सभी मुश्किल फासले,
कुछ भी ऐसा नहीं जो औलाद की खातिर करता नहीं है, बाप कभी थकता नहीं है... ।
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