सावन में जिनि भूलया भैया बहिनी रहिया जोहत होइहै।"
जेस जेस बीतत होई समइया धीर मना के खोवत होइहै।
बारहो मास तोहरे काज रहाला कबहू तो सुधिया आवत होइहै,
बचपन के ऊ रूसल मनावल कबहु तो अंखिया भीगावत होइहै।
उहै बहिन अब तोहके खाती निशिदिन देवता मनावत होइहै।
तोहरे ही मन के पूड़ी मिठाई होते सवेरेरे से पोवत होइहै।
जेस जेस बरसे सावन बदरिया बहिनी के नैना रोवत होइहै।
जवन बहिन तोहार दाहिनी बहिया उहै तरसे तोर कलइया खाती।
बांधब राखी दीप जलाके देवता मनाइब भइया खाती,
खोल केवड़िया बार बार तोहरे आवे के बटिया ताकत होइहै।
कबहु न भूले नैहर बहिन पर दूई दिना ऊ धीरज खोवे,
कार्तिक द्विजिया सावन राखी वहु दिना न बिरन सुधि लेवै।
कवन गुनहिया भइल हमसे बस इहे मना में सोचत होइहै।
बा विश्वास हमें मोर बिरना विपत्ति में हमका छोड़बा नाही,
हम रूसी जाई भले तोहसे तू स्नेह के धागा तोड़बा नही।
यान सम्मान सदा करबा कभी कड़वी बतिया बोलबा नाही।
यही विश्वास से बिरना के आवे के दिनवा जोरत होइहै।
जैसे बरसे सावन के बदरिया बहिनी के नैना रोवत होइहै।
बाप बना कभी, सखा बनेले मौके पर बनी जाबा माई,
दुनिया में सब कुछ मिली जाला एक न मिले सहोदर भाई।
कहे स्वरचित सुधा ये पढ़के सबके जियरा कसोटत होइहै,
सावन में जिनी भूलया ये भइया बहिनी रहिया जोहत होइहै।
जैसे बरसे सावन बदरिया बहिनी के नैना रोवत होइहै।
- सुधा पाण्डेय
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