जनसंख्या नियंत्रण
जनसंख्या का बढ़ता ही जा रहा भार।
सुन लो सुन लो त्रस्त धरती माँ रही पुकार।
और ना सह पाउँगी पीडित बहुत हूँ मै,
सहते-सहते जनसंख्या वृद्धि की मार।।
संसाधन सिमट रहे लघु हुए घर-द्वार,
बढ़ता ही जाए आवश्यकताओं का अंबार ।
जल -जंगल के दोहन से सन्तुलन बिगड़ा,
जमीन बची नहीं अब खड़ी हुई गगनोन्मुख मीनार।।
खाने की पूर्ति को होने लगा कैमिकल उपयोग,
फल-सब्जी अनाज द्वारा खा रहे सभी लोग।
इसी रफ्तार से बढ़ती रही, स्थिति न संभालो,
तो हो जायेगा एक दिन जनसंख्या विस्फोट ।।
हर तरफ बेरोज़गारों की बढ़ने लगी कतार,
भूख -प्यास के संकट का हो रहा आगाज।
सिर्फ सड़को के जाल से न जीवन चल पायेगा,
बिन कृषि के उद्योग न कितने ही लगा पायेगा।।
हजारो थी जहाँ वहाँ लाख हुई बढ़कर,
लाख थी जहाँ वहाँ करोड़ हो गई।
गांव नगर, नगर महानगर हो रहे,ऐसे क्या ?
सबको मयस्सर रोटी-कपडा-मकान हो पायेगा।।
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