लिखते-लिखते मन है ठिठकता,
कई प्रश्न खड़े हो जाते हैं।
जिधर निगाह है उठती मेरी,
घाव नए दिख जाते हैं।
कुपोषण से सूखे चेहरों पर
बचपन चुपचाप सिसकता है;
शिक्षा और गरीबी के बीच
हर सपना दम तोड़ता है।
स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत देखो,
हर कदम पर संकट मिलता है;
असली दवा के नाम पर अक्सर
नकली ज़हर ही बिकता है।
भ्रष्टाचार की जड़ें है गहरी,
दिन-दहाड़े फैल रही ।
घूस, मिलावट, कालाबाज़ारी—
जनता की साँसें छल रही ।
सच का चेहरा धूल में दबा,
झूठ सजे दरबारों में;
ईमान खड़ा कटघरे में है,
धोखा बैठा अधिकारों में।
लंगड़ा, अंधा, गूँगा, बहरा—
कानून हुआ बेहाल मेरा,
फिर भी हम हैं गर्व से कहते,
भारत बड़ा महान मेरा।
कब जागेगा देश हमारा,
कब बदलेगी यह तस्वीर?
जब सच, न्याय और ईमान जगेंगे,
तभी सँवरेगी भारत की तकदीर।
-सूबा लाल "अंजाना"
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