सुख-दुःख, धूप-छाँव जीवन के, इनसे ना घबराना है,
सीधी राहों पर चलने में भी, पाँवों में छाले आना है।
भाई-भाई सुख-दुःख दोनों, इनको गले लगाना है,
जैसा भी जीवन हो अपना, हँसते-हँसते जीते जाना है।
यश-अपयश, खट्टे-मीठे पल, जीवन की अमर कहानी है,
सुख-दुःख, जीना-मरना सबकी, जीवन में आनी-जानी है।
कर्मों का भी योग है इसमें, कम या ज्यादा पाने का,
अच्छे कर्मों का फल अच्छा, बुरे कर्म का फल बुरा पाना है।
कभी धूप की तपती राहें, कभी छाँव का डेरा है,
कभी खुशी का मेला लगता, कभी ग़मों ने घेरा है।
समय सदा एक-सा रहता नहीं, यह बात समझते जाना है,
बुरा समय भी बीत जाएगा, मन में दीप जलाना है।
फूलों की राहें मिलती हैं, तो काँटे भी मिल जाते हैं,
मंजिल पाने वालों के पथ में, रोड़े भी अड़ जाते हैं।
जो हिम्मत से कदम बढ़ाते, उनको आगे जाना है,
गिरकर फिर उठने वालों ने ही, इतिहास नया बनाना है।
धन-दौलत और मान-सम्मान, यहीं धरे रह जाते हैं,
प्रेम, दया और नेक कर्म ही, जग में याद रह जाते हैं।
अहंकार को त्याग हमेशा, मानवता अपनाना है,
दूसरों के दुःख में शामिल होकर, सच्चा सुख पाना है।
जो मिला उसी में खुश रहना, जो ना मिला उसे भूलो,
बीते कल का बोझ उतारो, आज को हँसकर जी लो।
कल क्या होगा कौन जानता, वर्तमान सजाना है,
हर पल को अनमोल समझकर, जीवन सफल बनाना है।
नफ़रत की दीवार गिराकर, प्रेम के दीप जलाना है,
टूटे हुए हृदयों को जोड़ो, रूठों को मनाना है।
जीवन चार दिनों का मेला, फिर सबको लौट जाना है,
अपने अच्छे कर्मों से ही, नाम अमर कर जाना है।
सुख आए तो गर्व न करना, दुःख आए तो रोना क्या,
जीवन एक अनमोल धरोहर, खोकर फिर से पाना क्या।
हँसकर जीना, प्रेम बाँटना, यही जीवन का गाना है,
सुख-दुःख दोनों साथी अपने, इनको गले लगाना है।
-सूबा लाल ‘अंजाना’
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