ढलती उम्र में कुछ करें न करें,
मन का बोझ हल्का जरूर करें।
बीती बातों को ढोते-ढोते,
क्यों अपने मन को भारी करें?
पुराने मित्रों से मिलते रहिए,
कुछ कहिए और कुछ सुनते रहिए।
दुख-दर्द अगर मन में पलता हो,
अपनों से उसको बाँटते रहिए।
पुरानी बातें सताती बहुत हैं,
कुछ यादें आँखें भिगोती बहुत हैं।
जो बीत गया, उसको भूल जाइए,
अच्छी यादों को ही दिल में बसाइए।
कोई मिले न मिले जीवन में,
खुद से हँसना सीख लिया करें।
आईना देखकर मुस्कुरा लें,
मन को थोड़ा खुश किया करें।
इस उम्र में लोग तो बोलेंगे,
कभी हँसेंगे, कभी कुछ कहेंगे।
हर बात को दिल पर मत लेना,
कुछ बातें सुनकर अनसुना करें।
चलते-फिरते गुनगुनाते रहें,
हँसते रहें और मुस्कुराते रहें।
शरीर साथ दे जब तक अपना,
अपने हाथों से काम करते रहें।
जो काम स्वयं कर सकते हों,
उसमें दूसरों पर निर्भर न हों।
छोटे-छोटे कामों में भी,
अपने जीवन का आनंद खोजें।
जो बातें मन को अच्छी न लगें,
उनको मन में जगह न दिया करें।
हर शब्द का उत्तर देना जरूरी नहीं,
कुछ बातों को चुपचाप छोड़ दिया करें।
बुढ़ापे की असली जीवन-चाबी,
तन से ज्यादा मन को संभालना है।
कम शिकायत, ज्यादा मुस्कान,
चिंता कम, खुशियाँ ज्यादा बाँटना है।
न बीते कल का बोझ उठाएँ,
न आने वाले कल से डरें।
आज मिला जो सुंदर जीवन,
उसको हँसकर जिया करें।
बच्चों से प्रेम, बड़ों का सम्मान,
मित्रों से अपनापन रखा करें।
थोड़ा समय प्रभु के नाम करें,
थोड़ा मन के नाम भी किया करें।
दूसरों की कमियाँ गिनने से बेहतर,
अपनी खुशियाँ गिना करें।
जितना मिला है जीवन में अब तक,
उसके लिए शुक्रिया किया करें।
उम्र ढलना अंत नहीं है,
जीवन का यह नया पड़ाव है।
मन में उमंग बची हो जब तक,
हर दिन जीने का एक नया भाव है।
इसलिए उम्र चाहे जितनी हो,
दिल को बूढ़ा कभी न होने दें।
हँसते रहें, मिलते रहें,
और मन को बोझिल कभी न होने दें।
-सूबा लाल "अंजना"
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