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कौन बनेगा मसीहा

                
                                                         
                            वह भी चाहता है कि उसके बच्चे पढ़ें-लिखें,
                                                                 
                            
वह भी चाहता है कि उनके सपने आसमान लिखें।
मगर फीस, किताब और पेट की लड़ाई में,
कितने ही सपने दम तोड़ देते हैं पढ़ाई में।

कहने को योजनाएँ हैं, भाषण हैं, वादे हैं,
गरीब के हिस्से में फिर भी अधूरे इरादे हैं।
कागज पर कितने उजले भविष्य बन जाते हैं,
जमीन पर मगर कई हाथ खाली रह जाते हैं।

गरीब को दया नहीं—अवसर चाहिए,
भीख नहीं—अपने श्रम का उचित मूल्य चाहिए।
उसके हाथों को काम और मेहनत को सम्मान मिले,
उसके बच्चों को शिक्षा, उसके घर को अरमान मिले।

कौन बनेगा मसीहा—यह सवाल बहुत छोटा है,
सच तो यह है कि समाज का हर हाथ जिम्मेदार है।
एक हाथ रोटी दे, दूसरा हुनर सिखाए,
तीसरा हाथ उसके बच्चे को विद्यालय पहुँचाए।

जब तक भूख किसी बच्चे की आँखों में पलती रहेगी,
जब तक मेहनत सस्ती और मजबूरी महँगी रहेगी,
तब तक विकास की हर चमक अधूरी कहलाएगी,
और गरीबी की चीख व्यवस्था को आईना दिखाएगा।
-सूबा लाल "अंजाना"
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