आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गरीब के आंसू

                
                                                         
                            नज़र जिधर भी जाती है,
                                                                 
                            
वहाँ बेचारगी का धुआँ उठता है।
हर मोड़ पर बेरहमी की परछाईं,
हर चेहरे पर अनजाना दर्द लिखता है।

बेख़ौफ़ जुर्मों का अँधड़ है,
हर साँस में भय पसरा है।
जनता की आँखों में प्रश्न जले—
सुरक्षित जीवन कहाँ ठहरा है?

गरीबों के हिस्से सूखे आँसू,
अमीरों का धन सागर-सा बढ़ता है।
कहीं भूख से काँपता बचपन,
कहीं सोने का पहाड़ खड़ा है।

रिश्तों की नसों में स्वार्थ घुला,
अपनापन राख हुआ जाता है।
जिसे देखकर आँखें भर आनी थीं,
उसे देखकर मन पत्थर हो जाता है।

दया-ममता किस धुंध में खो गईं,
प्रेम का दीप कहाँ जलता है?
मनुष्य तो भीड़ में बहुत खड़े हैं,
पर इंसान भीतर से घटता जाता है।

अभी समय है—जागो सब,
रात का सीना चीर सकते हैं।
दिल में मानवता का दीप जलाएँ,
तो बिखरे संसार को फिर जोड़ सकते हैं।
— सूबा लाल “अंजाना”
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 सप्ताह पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर