दिल कितना नाजुक-सा है,बिन छुए टूट जाता है,
शब्द भले ही पत्थर न हों,फिर भी चोट लगाता है।
मीठे बोलों की फुहारों से,पल में भावुक हो जाता है,
प्रेम भरे दो शब्द को सुन,सूना मन भी मुस्काता है।
कटु शब्दों के तीखे वार से,मन भीतर तक जल जाता है,
आवेश अगर हद पार करे तो,दिल रौद्र रूप दिखलाता है।
कभी किसी के दुख को देखकर,आंखों से आंसू आता है,
परपीड़ा को अपनी समझकर,दिल करुणा बरसाता है।
जब खुशियों का मौसम आए,यह हर्षित हो जाता है,
अपनों की मुस्कान देखकर,खुद भी ये मुस्कुराता है।
दिल में प्रेम, दिल में ममता,दिल में रहती है करुणा,
कभी क्षमा का दीप जलाए,कइयों को बनाए वो अपना।
दिल में आशा, दिल में सपने,दिल में विश्वास पलता है,
टूटे हुए मन को भी अक्सर,जीने का साहस देता है।
कभी यही दिल मोह में पड़कर,"लाल" विवेक भुलाता है,
सारी बुराई त्यागके ये दिल,दूसरों का जीवन सजाता है।
नफरत इसके भीतर आए तो,रिश्तों में दीवार बनाता है,
प्रेम अगर इसमें घर कर ले,पत्थर को भी इंसान बनाता है।
दिल कोई केवल अंग नहीं है,यह भावों का संसार है,
प्रेम, दया, सुख, दुख और क्रोध का,इसमें पूरा विस्तार है।
करुणा का यह गहरा सागर,संवेदना की गागर है,
जिसने दिल को जीत लिया हो,उसका जीवन अति सुंदर है।
"अंजना" दिल को चोट न देना,शब्दों को तौल के कहना,
क्या पता तुम्हारे एक शब्द से,प्रकाश से हट जाए रैना।
दिल जोड़ो तो प्रेम से जोड़ो,टूटे दिल को सहारा दो,
मानवता बरकरार रखें,कोई भी न बेसहारा हो।
धरा के जिस कोने में भी जाओ,प्यार ,प्यार और प्यार ही हो।
मानवता न एक सिर्फ हो,ग्राहक कई हजार हों।
-सूबा लाल "अंजाना"
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