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बेवफा हो ना सकी

                
                                                         
                            सोचती हूं ,हो जाऊं
                                                                 
                            
मैं भी बेवफा ,
पर तुम्हारा जैसा
हुनर पा ना सकी ।

दिल के दरवाजे
पर तुम्हारी दस्तक
अपने मन से
मिटा ना सकी ,
तुम अभी भी
यही कही हो,
तुम्हारी बेवफाई
को आज तक
पचा ना सकी।

गुस्ताख है ,ये आंखें
जो तुम्हें देखकर
फिर से तुम्हारी
और आने लगती है,
तुम मेरे नहीं हो
इतना ,इन आंखों
को समझ ना सकी।

तुम्हारे वायदे पर
तो ऐतबार था ,
तुम्हे चाहकर भी
पा ना सकी,
तुम हमेशा, तुम रहे
मैं तुम्हारी होकर
फिर अपनी कभी
किसी और की
,हो ना सकी ।

आंसू आते हैं तन्हाई में
क्यो मैं तुम्हें, आज भी
भी भूला ना सकी।
-सोनिया सैनी
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एक महीने पहले

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