तुमसे कुछ लिया है
जैसे सूखे पत्तों से लिया वैराग्य
ढलते दिवस से आख़िरी धूप
कसाई की हँसी
गिरगिट के रंग और रसायन
रूखे होंठों ने
सिर्फ़ अभिशाप नहीं लिया
सीखा है साँप की केंचुल उतारने का कौशल
और
आस्तिक ऋषि-सी सुरक्षा
जिसके पात्र में
एक मुट्ठी भिक्षा रखी
होना चाहता हूँ
उसी की तरह आवारा
जिसे कुछ दे नहीं पाया
उससे सीखा है
रिक्त लौट जाने का हुनर
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