घर में बैठे रहकर अपनी खिडकी के शीशों से,
गुप-चुप झांकती डूबते सूरज की रोशनी ओढ़े
बारिश की उस शाम को भीतर बुलाना चाहता हूँ
फ़लक पर बिखरे सितारों के लड्डू बना
उंगलियों की दरारों से रिसती रोशनी की चाशनी से
कुहनियां भिगोना चाहता हूँ
टिमटिमाते जुगनुओं की झालर बुन
बगीचे की अंधेरी हरियाली पर बिछाना चाहता हूँ
पर भूल जाता हूँ
पकड़ना हो तितलियां...
तो बाहर भी निकलना पड़ता है
बड़ी दूर बड़ी देर तक
भटकना भी पड़ता है
-रविकांत राऊत
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