आंदोलन तो बहुत देखे सबने,
देखा नहीं इसका असंस्कारित स्वरूप।
मर्यादाओं का किया इतना उल्लंघन,
भाषाओं का देखा बिगड़ा रूप।
माता पिता को हुई होगी शर्मिंदगी,
जब देखा अपने बच्चों को इस हाल में।
व्यथा अपनी सुनाये किसको,
कैसे फँसे बच्चे इस असभ्यता के जाल में।
क्या भारत का भविष्य होगा ऐसा,
असभ्यता की है असीमित पराकाष्ठा।
किस संस्कृति का है रंग चढ़ा इन पर,
बड़ों के प्रति नहीं कोई इज्जत, आस्था।
अपने उद्गार प्रकट करने का यह तरीका,
भारतीय संस्कृति का नहीं है हिस्सा।
बड़ों को सम्मान नहीं देना चाहते तो,
खत्म करो संस्कारी बनने का किस्सा।
-सीमा केडिया
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