जो पैमाने से छलका नहीं, वो जाम ही क्या!
जो बदनाम न हुआ, वो नाम भी नाम ही क्या!
न दुनिया को सुकूं, न ख़ुद को कोई खुशी,
करने को भला, वो काम भी काम ही क्या!
जिसमें डूब कर दिल को, न रहे सुध-बुध अपनी,
सुबह की वो धूप क्या, वो शाम भी शाम ही क्या!
रहे महफिल में जो खामोश, न धड़के किसी के लिए,
उस आशिक़ का तड़पता पैगाम भी, पैगाम ही क्या!
जो इश्क की राह में, ठोकर खा कर संभला ही नहीं,
उस अधूरे सफर का अंजाम भी, अंजाम ही क्या!
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