कल सपने में ही उनसे मुलाक़ात हो गई,
क्या बताऊं ऐ सबा, क्या-क्या बात हो गई।
देखा जो ख़्वाब मैंने, कि वो मेरे हो गए हैं,
गुलफ़िशाँ सी महकती मेरी हयात हो गई।
फिर आई ऐसी आंधी, उजड़ गया गुलशन,
यूँ लगा जैसे दिन में ही घनी रात हो गई।
तन्हाई ही बनी है अब साथी मेरे ग़म की,
थमी नहीं झड़ी, आँखों से बरसात हो गई।
बंद पलकों पर जब पड़ने लगी शुआएँ,
टूट गई नींद हक़ीक़त की शुरुआत हो गई।
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