जाने क्यों यह दिल मेरा रोता है बार-बार,
शायद इसे मिला नहीं कोई ग़मगुसार।
सुलगते-सुलगते सीने में धुआँ हुई ख्वाहिशें,
न जाने जलना है इसे और कितनी बार।
कतराने लगे हैं सब कि माँग न लूँ हक़ अपना,
लगा यूँ कि सबने कर दिया मुझे दरकिनार।
काँटे बो कर फूलों की चाहत, ये तो नादानी है,
जैसा करोगे वैसा भरोगे यही है दस्तूर-ए-संसार।
सीखें हम प्रकृति से, जो सिर्फ़ देना जानती है,
जीना उसका ही जीना है, जो औरों पर हो निसार।
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