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जीना उसका ही जीना है, जो औरों पर हो निसार।

                
                                                         
                            जाने क्यों यह दिल मेरा रोता है बार-बार,
                                                                 
                            
शायद इसे मिला नहीं कोई ग़मगुसार।

सुलगते-सुलगते सीने में धुआँ हुई ख्वाहिशें,
न जाने जलना है इसे और कितनी बार।

कतराने लगे हैं सब कि माँग न लूँ हक़ अपना,
लगा यूँ कि सबने कर दिया मुझे दरकिनार।

काँटे बो कर फूलों की चाहत, ये तो नादानी है,
जैसा करोगे वैसा भरोगे यही है दस्तूर-ए-संसार।

सीखें हम प्रकृति से, जो सिर्फ़ देना जानती है,
जीना उसका ही जीना है, जो औरों पर हो निसार।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 hours ago

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