पत्थर में प्राण जगाने वाले,
लोहों में स्वप्न सजाने वाले,
श्रम की हर एक रेखा में,
नवयुग का दीप जलाने वाले।
औजारों को सम्मान मिला,
मेहनत को अभिमान मिला,
जिसने जग को आकार दिया,उसको जग से प्रणाम मिला।
महलों से लेकर मंदिर तक,
सेतु से लेकर नगरों तक,
तेरी कला की छाप मिले,
धरती के हर एक कणों तक।
हथौड़े की हर चोट में,
निर्माण का संगीत बजे,
तेरे आशीष से श्रमिक के,
हर सूने हाथ में जीत सजे।
हे देव शिल्पी विश्वकर्मा,
तेरा सदा गुणगान रहे,
जिस हाथ में मेहनत बसती हो,उस हाथ में तेरा वरदान रहे।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X