आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मुरली की पुकार

                
                                                         
                            जब-जब मन का दीप बुझे, तुम बाँसुरी बन आ जाना,
                                                                 
                            
सूनी साँसों की गलियों में, मधुर सुरों को बरसा जाना।

श्याम सलोने चरण तुम्हारे, हर दुख का हैं एक किनारा,
डूब रही इस जीवन-नैया का, तुम ही बनना दृढ़ सहारा।

मोर मुकुट की शीतल छाया, तपते मन को ठंडक देती,
तेरी मीठी मुस्कानों से, हर उलझी तक़दीर सँवरती।

राधा-राधा गूँजे मन में, प्रेम सुधा फिर झरने लगती,
तेरे नाम की एक रटन से, सूखी डाली भी हरियाती।

गीता का हर एक उपदेश, जीवन का आधार बनाता,
कर्म-पथों की कठिन डगर में, सत्य का दीपक जलवाता।

हे गिरिधर बस इतनी कृपा, मन अभिमान से दूर रहे,
हर धड़कन में तेरा नाम हो, हर साँस तुझमें ही भर रहे।

माखन-चोर मेरे आँगन में, प्रेम का उत्सव ले आना,
जब-जब मन का दीप बुझे, तुम बाँसुरी बन आ जाना।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर