सुबह से पहले नींद जगाती,
सपनों को तकिए पर सुलाती।
हाथों में फिर काम सजाती,
हँसकर दुनिया रोज़ बसाती।
चूल्हा, चौका, रोटी, दाल,
हर दिन मेरा यही कमाल।
सबकी थाली प्यार से भर दूँ,
अपने हिस्से ठंडी थाल।
सबको पूछूँ, सबको मानूँ,
सबकी इच्छा सिर पर जानूँ।
अपनी चाहत जब भी बोलूँ,
चुप रहने का फ़र्ज़ निभाऊँ।
माँ की याद जो दिल तड़पाए, मन चुपके से घर को जाए।
मायके जाऊँ? होंठ जो बोलें,
पहले सौ फ़रमान तो आए।
उनसे पूछो, इनसे पूछो
हर उत्तर में बस इंतज़ार।
बेटी होकर जन्म लिया था,
बहू बनी तो क्यों अधिकार?
हँसी मेरी भी सच्ची होगी,
थकान मेरी भी कुछ होगी।
मैं भी इंसाँ, मैं भी धड़कन,
मेरी भी तो चाहत होगी।
सेवा मेरा धर्म सही है,
पर सम्मान भी कर्म सही है।
बहू अगर मुस्काकर जी ले,
घर का हर मौसम सही है।
मत तौलो रिश्तों को केवल,
फ़र्ज़ों की ज़ंजीरों से।
बहू भी खिलती है उतनी ही,
थोड़े से विश्वासों से।
घर की धड़कन, घर की शान,उससे ही महके आँगन-धाम।
बहू नहीं बस रिश्तों की डोरी,
वो भी है इक जीती जान।
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