कुछ लिखा था, कुछ रह गया,
वक़्त की धूल में बह गया।
पहला पन्ना बोल उठा,
दूजा पन्ना चुप रह गया।
कलम चली तो स्वप्न खिले,
मन के सारे दीप जले।
मोड़ मिला कुछ ऐसा फिर,
शब्द अधूरे वहीं मिले।
शुरुआतों का शोर मिला,
अंत मगर कमजोर मिला।
राह बनी तो मंज़िल रूठी,
कदमों को बस मोड़ मिला।
कुछ तस्वीरें रंग भरी थीं,
कुछ उम्मीदें संग खड़ी थीं।
एक फ़्रेम तो सज भी पाया,
दूसरी आँखें नम पड़ी थीं।
ख़त लिखा पर भेज न पाए,
गीत बने पर गा न पाए।
मन की सारी धड़कन लिख दी,
अंतिम पंक्ति ला न पाए।
खाली पन्ना पूछ रहा है-
मेरी बारी कब आएगी?
अधूरी सी इस दास्ताँ को
पूरी दुनिया कब गाएगी?
शायद किस्मत यही कहे-
हर सपना पूरा होता नहीं।
कुछ किस्से बस शुरू ही होते,
उनका अंत कहीं होता नहीं।
फिर भी कलम उठती रहेगी,
हर मौसम में चलती रहेगी।
अधूरे पन्नों की ये दुनिया,
एक दिन खुद ही पलटी रहेगी।
क्योंकि जो पूरा हो जाए,
वो अक्सर भुला दिया जाता है।
जो अधूरा रह जाए यारों,
वही उम्र भर गुनगुनाया जाता है।
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