उनकी ख़राबियाँ भी, ख़ूबी लगने लगी,
कहीं ये मोहब्बत की निशानी तो नहीं।
दोशीज़ा से उम्रभर नज़रें बचाते रहे हम,
अलग-सी गुदगुदी, नई जवानी तो नहीं।
वो कभी-कभी ही, पास होते हैं हमारे,
हफ़्तों तक उनकी ख़ुशबू जाती तो नहीं।
हम इतना कुछ लिख दिए उस मेहरबाँ पे,
उन्हें लगने लगा, शायर शराबी तो नहीं।
ख़्वार ही होते रहे हम, उनकी सोहबत में,
यूँ इश्क़ में रुसवाई, कोई ख़राबी तो नहीं।
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