महकता रहता है
कोई अनाम प्रेम मेरे भीतर
मन की एक अलग बस्ती है
गुमसुम निःशब्द निष्काम बस्ती,
तन-मन का अलग विज्ञान है
जो मन को ज्ञात है
वह तन को नहीं ज्ञात
जो तन की इच्छा है
वह मन को नहीं राज़ी
ठहरा है बरसों से
कोई अनाम प्रेम मेरे भीतर।
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मेरी कल्पनाओं के बगीचे में
भरमार है हसीं रंगीन फूलों की
मेरी आँखों में तैरती है बगिया
अतीत से वर्तमान की,
विप्लव जीवन के सहमे रहते हैं
मेरी रचनात्मकता के आगे
नतमस्तक रहती हैं
नकारात्मक शिकायतें नाराजियाँ घृणाएं
प्रेम पल्लवित है मेरे मन के द्वारे,
ठहरा है बरसों से
कोई अनाम प्रेम मेरे भीतर।
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आधुनिकता ने नहीं बदले विचार,
सुख-सुविधाओं ने नहीं समेटी चादर
धन वैभव से नहीं खरीद सका मैं,
अपनी इच्छाओं का समंदर
नित बदलती आकाँक्षाओं ने
कहीं नहीं पहुँचाया मुझे,
मीलों चल चुका हूँ मैं,
किंतु हर संध्या की थकान ने,
उसी अधूरेे बिस्तर पर सुलाया मुझे,
बातूनी दीवारें उलझती हैं मुझसे
शरारती तकिया छेड़ता है मुझे,
ठहरा है बरसों से
कोई अनाम प्रेम मेरे भीतर।
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लाखों बार जप ली गायत्री मैंने
उँगलियों की पर्व पर जनेऊ फेरेे,
हजारों बार दी हैं
तुलसी में गंगाजल की धाराएँ
सुबह सूरज को अर्घ्य,
शाम शशि को दीपदान,
छोपहर की तपती गरमी में
पौष की ठिठुराती बयारों में
अनगिनत उपक्रम किए होंगे मैंने,
वय की उँगलियाँ थामे गिनते,
आगे बढ़ना मेरी नियति है, प्रकृति है,
किंतु मन का बोझ उतरता नहीं,
ठहरा है बरसों से
कोई अनाम प्रेम मेरे भीतर।
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