दिल ठहर सा जाता है, पुरानी यादों में,
उन्हें भुलाकर, आगे बढ़ना था राहों में।
मैं प्यार करता रहा, एक ऐसे बुत-दिल को,
जो उलझा था, कई मोहब्बतों के गुनाहों में।
आज भी इत्र महका करती है, बदन में मेरे,
यों तो अरसा बीत गया, उन्हें आए बाँहों में।
भटकने का मलाल ही भला क्यों होगा हमें,
हम रोज़ शाम ढले, वापस अपनी पनाहों में।
साफ़ दिल बंदा, बड़ा नहीं माना जाता यहाँ,
ईमानदारी गिराती है, लोगों की निगाहों में।
वो कर पड़ा था तर्के़-मोहब्बत, ज़ल्दबाज़ी में,
मगर चलता आज भी है, मेरी ही सलाहों में।
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