बात कुछ भी न थी, पर थी भी बहुत,
वो दूर रहकर भी, मेरे पास थी बहुत।
कई बरस हो गये, मयख़ाने पे बैठे हमें,
बिना प्याला, उनकी नज़र से पी बहुत।
जाने कौन मेरे संग रहता है इत्र की तरह,
एक तस्वीर, मेरी किताबों में छुपी बहुत।
एक और ख़त है उनका जिसे खोला नहीं,
आड़े वक़्त सुकू़ं देगी, उनकी चिठ्ठी बहुत।
दिन ऐसा भी आया, जब पाँव न उठ सके,
यों तो चारों तरफ़ थी, खाली जमीं बहुत।
जिस्म से बहुत आगे हैं, ताल्लुक़ात हमारे,
हमने कब कहा, मेरा महबूब है हसीं बहुत।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X