वो बारिश की बूंद ने
जो सराबोर किया मुझको ।
वो राह मे पड़े गड्ढों ने
जो याद कराया शेरशाह सूरी को ।।
जो ग्रांड ट्रंक बनाकर तूने
क्यूं पक्की सड़क के सपने दिखाए ।
सोच कर निकले उस राह पर
मिलेगा वो शेरे शहंशाह घर पर।।
कही इस कंद्रा में सोया हो
कहीं इस गड्ढे में खोया हो।
हर खड्ढे को खटखटाया जो
शेरशाह लापता हो गया वो।।
सोच इक दिन निकल पड़े यूं
चले सासाराम में ढूंढे इसको।
पर मेहनत बच गई हमारी जो
राह के इक होर्डिंग पर नजर आए वो।।
हाथ जोड़कर अकड़े दिखे है
नेताजी के पीछे खड़े मिले हैं ।
जन्मदिन की बधाईयां दे रहे हैं
युवराज को मक्खन लगा रहे हैं ।।
हमको माज़रा समझ आया
वरदहस्त नेताजी का नज़र आया।
राह के गड्ढे की ओर नजरिया बदला जो हिरोइन के गाल के डिंपल नजर आए वो ।।
सही कहा किसी ने अब
बहुत बडे़ अज्ञानी हैं हम।
क्यूं सिस्टम का रोना रोते हो
क्यूं इन खड्ढो में अवसर न देखते हो।।
इन गड्ढों में ही सोने की खान है
नेताजी की तिजोरी मालामाल है।
घर वापसी पर यूं सोच रहे हैं
अब बदन दर्द से क्यूं जूझ रहे हैं ।।
जो गड्ढे का इलाज करने शेरशाह को ढूंढते हैं
वो शारीरिक इलाज का बिल खुद भर रहे हैं।।
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