आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शीर्षक - जन आंदोलन

                
                                                         
                            उठे दूर जो कही धुआं
                                                                 
                            
रहे न कोई अनछुआ।
दिखे न ज्वाला पर्वत कहीं
न बहता मिले लावा कहीं।
भीतर कहीं धधक रहा था
व्याकुल मन बिखर रहा था।
धर्म आस्था पर

दिखे शोर
भारी है उस पर भी चोर।
जहां सुनवाई की दरकार हो
हर ओर निराशा के बादल हो ।
इक हवां का झोंका आएगा
इक चिंगारी भड़का जाएगा।
तब जनांदोलन उभरता है
युवा सड़कों पर उतरता है।
इक आशा की किरण आएगी
किसी ओर तो बदलाव लाएगी।
उत्साह उमंग भारी है
गर्म खून की चहलकदमी ज़ारी है ।
जब न माने जन को जनार्दन
तब होगा सत्ता का परिवर्तन।
यही नियति है इस जग की
वही प्रतिक्षा है कल्कि की।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर