उठे दूर जो कही धुआं
रहे न कोई अनछुआ।
दिखे न ज्वाला पर्वत कहीं
न बहता मिले लावा कहीं।
भीतर कहीं धधक रहा था
व्याकुल मन बिखर रहा था।
धर्म आस्था पर
दिखे शोर
भारी है उस पर भी चोर।
जहां सुनवाई की दरकार हो
हर ओर निराशा के बादल हो ।
इक हवां का झोंका आएगा
इक चिंगारी भड़का जाएगा।
तब जनांदोलन उभरता है
युवा सड़कों पर उतरता है।
इक आशा की किरण आएगी
किसी ओर तो बदलाव लाएगी।
उत्साह उमंग भारी है
गर्म खून की चहलकदमी ज़ारी है ।
जब न माने जन को जनार्दन
तब होगा सत्ता का परिवर्तन।
यही नियति है इस जग की
वही प्रतिक्षा है कल्कि की।
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