मिट्टी की वो सोंधी खुशबू
जब हवा में घुलती है,
सुकून की एक नई खिड़की
ज़हन में खुलती है.....
बूंदों का गिरना जैसे
कोई सदियों पुरानी दुआ हो,
या तपती हुई रूह को
छूकर गुज़री कोई हवा हो.....
प्रकृति के पास हर मर्ज़ की
एक अनकही दवा है,
बस सुनने वाला चाहिए
कि पत्तों ने क्या कहा है....
शहर की कंक्रीट में हम
कुदरत को भूले हैं,
सुकून को छोड़कर,
तनाव की छाँव में बैठे हैं....
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