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शीश महल मे रहकर इंसा

                
                                                         
                            ऊँचेमहलों की बुनियादों का हश्र यही बतलाता है
                                                                 
                            
शीश महल में रहकर इंसा पत्थर दिल हो जाता है

भूखे नंगे बेबस यूँ जिसके पावों में झुके हुए हैं
शहंशाह भी आखिर एक दिन मिट्टी में मिल जाता है

गुलशन सूख गया पर उनको नहीं यहाँ की कुछ परवाह
उनके दरखत पर कागज का नीला गुल खिल जाता है

गर्दन की जुम्बिस पे चलता है दिल का सारा कारोबार
एक इशारे से हर हाकिम भरता पानी मिल जाता है

महज ख्वाब ले जेबों में जो निकले पड़े हैं नंगे पाँव
धूल फांकते बच्चों में गुदड़ी का लाल भी मिल जाता है

जाग रहें जो चाँद सितारे आसमान के आँगन में अब
सूरज का पहरा लगते ही घर का रस्ता मिल जाता है

कश्ती कागज की तैराकर बच्चा है ख़ुश आज बड़ा
घर के आँगन में उसको बहता दरिया मिल जाता है

रोज तिजारत करते हैं अब हँसते चेहरे मीठे बोल
दास अदाकारी का खुलकर दाम यहाँ मिल जाता है
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8 घंटे पहले

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