हँसने का बहाना है ना रोने का बहाना है
जीना है या जीने की बस रस्म निभाना है
ज़ब हाथ में पत्थर हैँ निगाहों में छुपे खंजर
लगता है शिकारी का हम पे ही निशाना है
महसूस नहीं करता है दर्द जो अपनों का
कहने को है अपना पर सच में बेगाना है
निकला जो अंधरे में अँधेरे में ही लौटेगा
हर आम जिन्दगी का इतना ही फ़साना है
कुछ देर अभी और मधुर नींद में रहना था
मम्मी ने झिझोड़ा क्या स्कूल नहीं जाना है
क्या दास बतायेंगें हाले दिल अपना हम
सुनता ही नहीं कोई पर सबको सुनाना है. .
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