अपना अंदाजे बयां तो रास नहीं आएगा
दर्दे का मेरे कभी अहसास नहीं आएगा
बज्म में जायेंगे तो अजनबी से हम होंगे
दिल से मगर कोई मेरे पास नहीं आएगा
हम अगर जान भी देंगें तो फिर भी उन्हें
बेगुनाही का मेरी विश्वास नहीं आएगा
चंद लम्हों के लिए उसकी इबादत करके
पाप जिन्दगी में कभी पास नहीं आएगा
दोस्ती या दुश्मनी को दास दिल से निकाल
न्याय का वरना तुझे आगाज नहीं आएगा!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X