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सपने मेरे कहाँ खो गए

                
                                                         
                            सपने मेरे कहाँ खो गए इस भागती हुई दौड़ में,
                                                                 
                            
खुद को ही भूल गया हूँ ज़िंदगी की इस होड़ में।
जिस मंज़िल की तलाश थी, वो भी अब अनजान लगती है,
भीड़ तो बहुत है साथ मेरे, फिर भी तन्हाई सी लगती है।

कभी हँसता था बेवजह, अब वजहें ढूँढता हूँ मुस्कुराने की,
कभी ख्वाहिशें थीं दिल में, अब आदत है उन्हें दबाने की।
वक़्त ने सिखा दिया है, हर किसी का साथ नहीं होता,
हर अपना दिखने वाला इंसान, दिल के पास नहीं होता।

चलते-चलते थक गया हूँ, मगर रुकना भी मंज़ूर नहीं,
दिल टूटा है कई बार, मगर जीना अभी मजबूर नहीं।
जो खो गया उसे पाने की अब ज़िद नहीं करता,
जो मिला है ज़िंदगी में, उसका भी गिला नहीं करता।

शायद फिर किसी सुबह में, ये रात ढल जाएगी,
मेरी खोई हुई हँसी भी लौटकर आएगी।
फिर से आँखों में मेरे कुछ सपने जवान होंगे,
और हम भी एक दिन अपने नाम से पहचाने जाएंगे।

क्योंकि ये सफ़र अभी बाकी है, कहानी अभी अधूरी है,
हार मान लेना आसान है, मगर जीत अभी ज़रूरी है।
आज चाहे खुद से ही क्यों न थोड़ा दूर हूँ मैं,
कल अपने ही सपनों का सबसे खूबसूरत नूर हूँ मैं।

 
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5 दिन पहले

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