हाँ मैं एक अभिनेत्री हूँ
हुस्न है, दौलत है, शौहरत है
नहीं है तो इज़्ज़त, वो दर्ज़ा जो कलाकार को दिया जाए
इल्ज़ाम भी दिया किसे जाए,
मुझे भी थी मक़ाम की चाह, उन्हें भौरों की,
तो पराग मुझे बनाया गया,
कुछ और थी मैं, कुछ और ही मुझे बनाया गया
अब रोकर भी और क्या किया जाए
जो राह चुनी थी मैंने , रास्ता ही ना था ख़ुद की नुमाइश के अलावा,
सोचा हुनर परखा जाएगा, पर परखा गया मेरे हुस्न को सर से पैर तक घूरा गया, पर ना पहचाना असल फ़न को
मैं क़िरदार निभाना चाहूँ पर चाहने से क्या हासिल होता है,
अब तो हर पल इस बैरी जिस्म से ही गिला होता है
जो नज़रें देखना चाहती हैं फ़क़त वही दिखा देती हूँ , तस्वीरों में हँसती नज़र आती हूँ, आँख सेंकने के काम आ जाती हूँ,
जिन निग़ाहों से मुझे देखा जाता है, वो बहुत पाक हैं बख़ुदा,
मुझ पर नापाक होने का इल्ज़ाम है, वो कहते हैं मुझे नाख़ुदा
ना जाने कैसे कैसे तमगे हासिल हैं मुझे,
आख़िरकार मेरा बदन ही सब कुछ है, मैं कुछ भी नहीं,
जैसे महज़ खिलौना ही समझ लिया है मुझे
ज्यों ही चालीस पार हुई, अब मैं बदन नहीं रही,
जो अरमान जगा दे, अब वैसी नग्न नहीं रही
मेरे हमउम्र मर्द कलाकार साठ बरस के अब भी हैं जवाँ
यौवन ढलते ही मैं बना दी गई पर्दे पर माँ
माँ -बहन ही सही क़िरदार तो निभा रही हूँ,
अब कहीं जाकर मैं अभिनेत्री कहला रही हूँ
-शिवम् खरे
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