आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नानी मेरे पंख गर होते

                
                                                         
                            नानी मेरे पंख गर होते..
                                                                 
                            
आसमान के सैर मैं करता
चिड़ियों के संग मेल मिलाकर
मिलो तक दूरी तय करता

नानी मेरे पंख गर होते...
चुगता मैं भी आंगन के दाने
अपने हो या घर दूसरों कि
लोग भले हो सब अनजाने
फुदक कूद करता डाली पर
बनता मौसम जब मधुर सुहाने

नानी मेरे पंख गर होते...

आसमान के सैर मैं करता
बहे तूफान चाहे अम्बर में
शिवा के होते कभी ना डरता
नानी मेरे पंख गर होते...
 - शिव शंकर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर