आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सबसे पहले गहरी सी साँस भरूंगी

                
                                                         
                            मैं; आँखें बंद कर
                                                                 
                            
सारा जहाँ घूम आती हूँ
बस शुरुआत खुद से करूंगी ।
सबसे पहले गहरी सी साँस भरूंगी
फिर देखूँगी तमाशे
इंसानी ज़ुबान के
चलूँ ; शहर, नस्ल, धर्म,
ईमान के ,
अरे! बगल में मानवता की बस्ती
भी तो देखी थी
फिर अमेजन गई उठकर
वेगि- सी,
ओजोन तक सैर कर आई हूं
साथ अंटार्कटिका की खबर भी लाई हूं,
अंतरिक्ष की तो पूँछो ही मत
सागर को तो लिखे हैं खत
कि बचाकर रखना बच्चों को
मानव विकास की मिसाइल गिरने वाली है
वैश्विक विधि की यात्रा तो
मैंने अभी अभी टाली है,
वसुधा रक्षा के देश तो कल ही गई
फिक्र न करें
राहत कार्य की विदा(सौगात )न लई;
फोरम , मीडिया, जुबां की सड़क पर
दौड़े चली जाती हूँ
हाँ जी चर्चा हूँ मैं !
सारा जहाँ घूम आती हूँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
16 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर